ये बैल नहीं


ये बैल नहीं,
ये बैल नहीं,
ये बैल नहीं,
मेरे जवानी का,
दम्भ हैं.
मेरी आँखों की,
ज्योति,
ह्रदय की धड़कन,
और मेरे मुख का,
तेज हैं.
इनके घुंघरू से,
उठती है सीने में,
मेरे ज्वाला।
मेरे रातो का,
ख़्वाब,
दिल का,
अरमान,
और मेरी जवानी का,
अहंकार हैं.
झूमते हैं,
बहते हैं,
सींगो को लड़ा के.
मलते हैं,
दलते हैं,
उछाल -उछाल के.
मेरे खेतों का,
बहार,
मेरे आँगन का,
श्रृंगार,
और मेरे जीवन का
त्यौहार हैं.

परमीत सिंह धुरंधर 

मेरे बैल


मेरे बैलों ने आज फिर से,
अपनी ताकत दिखाई।
देख के हरियाली,
सावन बरसने चली आई.
जब आस मेरी टूटती है,
तो ये झूम – झूम के बहते हैं.
जब सांस मेरी थकती है,
रुक -रुक के ये बहते हैं.
मेरे बैलों ने आज फिर से,
अपनी मोहब्बत दिखाई।
देख के मेरे तन पे पसीना,
वो आँचल लिए दौड़ी आई.

परमीत सिंह धुरंधर 

इल्तिजा


इतना भी मत लूटो,
की जीवन ही न रहे,
कुछ तो साँसे रहने दो,
दफनाने से पहले।
बड़ी शिद्दत से तुम्हे चाहा था,
बड़ी शिद्दत से तुमने लूटा है,
कुछ तो मुद्दत दे दो,
ताकि ये आसूं कब्र में न निकले।

परमीत सिंह धुरंधर 

ख़ास जिंदगी


थोड़ी – थोड़ी आग है, थोड़ी सी बरसात है,
ये जिंदगी मुझे खुदा, अब भी लगती बड़ी ख़ास है.
ठोकरें भी मेरे हौसले तो नहीं तोड़ पाती हैं,
काँटों के बीच में ही तो कलियाँ मुस्काती हैं.
थोड़ी – थोड़ी आस है, थोड़ी सी प्यास है,
ये जिंदगी मुझे खुदा, अब भी लगती बड़ी ख़ास है.
टूटते ख़्वाब भी नहीं मुझे रोक पाते हैं,
काँटों के बीच में ही तो फूल मुस्काते हैं.

जलता दीपक


मेरी सारी दौलत ले कर,
वो सोहरत मुझे लौटा दो,
जब तुम कहती थी,
मेरे कानों में,
की ये जलता दिया बुझा दो,
वो जलता दीपक बुझा दो.
मेरी सारी खुशियां ले कर,
वो ग़मों की राते लौटा दो,
जब तुम कहती थी,
मुझसे,
की वो खुली किवाड़ भिड़ा दो,
वो खुली किवाड़ भिड़ा दो.

परमीत सिंह धुरंधर 

राखी


एक छोटे से मंदिर में,
एक छोटे से बच्चे के,
नन्हे हाथों पे,
प्रेम के दो धागे,
बाांध के बहना बोली।
की, भूल न जाना भैया,
उठा के मेरी डोली।

परमीत सिंह धुरंधर

मैं नहीं हूँ


मंजिलों को पाने के लिए,
समझौतों पे समझौते हुए.
एक बार मंजिल मिल जाए,
तो फिर,
कौन अपने, कौन पराये।
ये वसूल रखने वालों की,
भीड़ में मैं नहीं हूँ.
एक ही समय में खाता हूँ,
सेवइयां और मछलियाँ, दोनों
ईद और दिवाली के,
इंतज़ार में बैठा कोई,
मजहबी मैं नहीं हूँ.
और उठता हूँ आज भी,
माँ की लोरी सुन कर,
रेडिओ मिर्ची और एफ. एम.,
से जागने वालो की,
जामत में मैं नहीं हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

ज्ञान


ज्ञान वो ही, विज्ञान वो ही,
जिसमे ना अभिमान हो.
और बिक जाए जो बाजार में,
उसका फिर क्या सम्मान हो.
रक्त वो ही, वक्त वो ही,
जो अपने साथ हो,
जो खड़ा हो दुश्मनो,
की भीड़ में,
उससे फिर क्या लगाव हो.

परमीत सिंह धुरंधर 

सैया हिमालय में चलके


जमाने की ये भीड़ सैया, ना भाये हमके।
चलअ बनावअ कुटिया, हिमालय में चलके।
छोड़ के अइनी हम माई के अंगना,
की बाँध के रखे तोहके अपना आंचरा।
की घरवा के ई खटपट सैया, ना भाये हमके।
चलअ बनावअ कुटिया, हिमालय में चलके।
की देहिया दुखाये ल, रात-दिन करके,
एगो तू रहतअ तअ ना कहती ई बढ़के।
पर सब केहूँ के कचर-कचर सैया, ना भाये हमके।
चलअ बनावअ कुटिया, हिमालय में चलके।

परमीत सिंह धुरंधर 

एक आशिक़ की इल्तिजा जमाने से: अभी तक अपनी महबूबा ढूंढ़ रहा हूँ…….


वो क्या था,
मेरा ख़्वाब,
या कोई हकीकत।
मेरी खुली आँखों,
का सच,
या फिर,
बंद पलकों का,
कोई कमाल।
मैं आज तक नहीं,
जान पाया।
ऐसी बारिश जो,
फिर दुबारा न हुई।
वो मुलाकात,
जिसमे पल तो गुजरे,
साथ, पर मैं,
पहचान न सका.
एक क्षण को वो,
सामने थी, जैसे
सुबह की उषा.
जैसे, बादलों के
योवन को चीरती,
मीठी धूप.
जैसे पलके खुलने,
से पहले, आँखों में
पला मीठा सपना।
आज भी भागता हूँ,
आज भी रोता हूँ,
आज भी ढूंढता हूँ।
सोचता हूँ की,
कहीं तो मिलेंगी,
कभी तो दिखेंगी।
इस बार वैसी,
गलती नहीं।
पर मन भयभीत है,
कैसे पहचानूँगा।
बस देखा ही तो था,
वो भी एक क्षण को।
लेकिन बरसो का सुख,
दे कर, वो छुप गयी,
पूर्णिमा की चाँद सी।
सुबह की ओस सी।
कहीं बदल न,
गयीं हों।
कहीं घूँघट न,
रखती हो अब।
हर पल डरता है,
मेरा दिल,
हर पल भयभीत है,
मेरा दिल।
ये सोच कर की,
कहीं अब घर से ही,
ना निकलती हो.
पर मैं तो घर भी नहीं,
जानता उनका।
ना ही जानता हूँ,
पता उनका।
ना कोई फोटो ही है,
ना कोई जानकारी।
पर एक कोसिस है,
आज भी मेरी लड़ाई है,
अपनी किस्मत से।
शायद मिल जाए,
कभी दिखा जाएँ,
इन राहों में,
दिन में या रातों में,
दिल्ली में या पुणे में।
आज भी ढूंढ़ रहा हूँ.
तो दोस्तों,
उन्हें घरो से निकलने से,
मत रोको।
उन्हें घूँघट या पर्दा करने,
को मत कहो.
तो दोस्तों, उनपे हमला,
मत करो,
उनको जख्म मत दो।
जब तक वो मुझे,
मिल नहीं जाती।
उनका बलात्कार,
मत करो।
की मैं,
अभी तक अपनी,
महबूबा ढूंढ़ रहा हूँ।

परमीत सिंह धुरंधर