फितरत


कहाँ तक जला के रखूं उमिद्दों का दिया,
हवाओं का रुख तो मेरे हाथ में नहीं।
मोहब्बत तो बहुत है उनको हमसे,
रिश्तों को निभाना उनकी फितरत नहीं।
क्यों करते हो शिकायत हुस्न से,
वो क्या वफ़ा करे जब तेरी किस्मत नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

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