दफ़न करूँ कैसे, कहाँ, मोहब्बत,
कभी मैंने ही जर्रे-जर्रे पे उनका नाम लिखा था.
अब कैसे कह दूँ उनको खुदगर्ज, बेवफा,
जिसे मोहब्बत में कभी खुदा कह के मैंने ही पूजा था.
वो मिलती थी सज – सवर के रोज हमसे,
हमने कब सोचा था, वो हम नहीं, कोई दूजा था.
परमीत सिंह धुरंधर