दौलत


शौक रखता हूँ तैरने का सागर की लहरो पे,
पर कमबख्त ये प्यास दरिया तक खींच लाती है.
सोचता हूँ कहीं गावं में बस जाऊं, पर
दौलत की चाहत शहर तक खींच लाती है.

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत


नजरो से सियासत होती है,
अक़्ल तो बजीर रखते हैं.
जुदाई का नाम है मोहब्बत,
जोड़े वाले तो बस तकदीर रखते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

हुकूमत


चमक को छोड़ दो,
हल्दी पीसने पर ही हैं निखरती.
सास सीधी हो या हो गूंगी,
बहु को हमेसा है अखरती.
ये लड़ाई है हुकूमत की,
चाहे आँगन हो या हो दिल्ली.

परमीत सिंह धुरंधर

सौदा


रहनुमाओं की भीड़ थी और मैं लूट गया,
ये ही तो उनकी अदा थी हर शख्श मुख मोड़ गया.
जरा सी नाकामयाबी रिश्ते समझा देती है,
कीमत कम हुई मेरी बाज़ार में और वो सौदा बदल गया.

परमीत सिंह धुरंधर

काजल


दीवानों की बस्ती अब कहाँ मिलती है,
अब तो सितारों का चमन है.
तुम जिसे मोहब्बत बता के इतरा रहे हो इतना,
जरा गौर से देखो उसमे कितने पैबंद हैं.
आँखों में काजल लगा के दिल चुरा ले मेरे,
ऐसा चेहरा आज तक ढूंढ रहा हूँ.
जो भी मिलते हैं इन राहों में,
उनके तो गालों, हाथों,
हर अंग पे लगा कुछ- न- कुछ है.
मैं कितना भी कहूँ अपनी सच्चाई,
उनकी अदा के सामने तो सब जूठ है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

शौक


बचपन के शौक जवानी को दुःख देते हैं,
और जवानी की मौज़ बुढ़ापे को रुला देती है.
कोई क्या सितम ढायेगा मुझपे,
जिसकी औलाद ही उसे गैर बता देती है.
मोहब्बत का शौक लेकर चला था,
हाथों में गुलाब लेकर चला था.
अंदाजा नहीं था जमाने के नए रूप का,
जहाँ फ्रेंडशिप ही अब सबकुछ बिकवा देती है.
क्या किस्सा सुनोगे दोस्तों, उनकी डोली उठने के बाद,
अब तो जवानी भी बुढ़ापे का एहसास देती है.
इतना तरसने के बाद भोजन का क्या,
ऐसा खाना अब भूख और बढ़ा देती है.
मुझसे मिलने आते हो तो मेरा पता मत पूछ,
मेरे नाकामयाबी, घर आने वाली हर राह में दिए जल देती है.

परमीत सिंह धुरंधर

निराला सैयां


हमर सैयां बारन बड़ा निराला,
जतना खालन मीठा ओतने तीखा।

परमीत सिंह धुरंधर

सैयां के हाल


सुबह होते कहलन सैयां,
अंखिया में काजल लगावेला।
रतिया में सैयां खुदे,
सारा काजल चुरा लेहलन।
का कहीं सखी,
आपन सैयां के हाल,
दिनवा में पहनाके सब सोना-चाँदी,
रतिया में देहिया से झार लेहलन।

परमीत सिंह धुरंधर

थाती


रतिया तहरे से हाथ लड़ा के,
चूड़ी-कंगन, हँसुली हेरइली।
अइसन जीत के का करीं,
जब अकेले हम हीं आपन थाती लुटाइली।

परमीत सिंह धुरंधर

कलम और दिल


बहुत लिखूंगा ए कलम तुझे अपना बनाकर,
किसी सितमगर-जालिम से अपना दिल लगाकर।

परमीत सिंह धुरंधर