वो रातो का श्रृंगार,
मेरी आँखों से करती हैं.
इश्क़ हो ना हो मुझे उनसे,
मगर वो मुझसे बहुत प्यार करती हैं.
ये सच है की हमारा मिलन,
परिवार वालों ने कराया था.
मगर अब वो जन्मो की,
जानी-पहचाननी सी लगती हैं.
मुझे कहाँ याद आती है उनकी,
दोस्तों की भीड़ में.
मगर सहेलियों के बीच,
वो मेरा ही चर्चा चलाती हैं.
दिन में कहाँ फुर्सत है उनको,
की पास आके मेरे बैठें.
वो तो बस छू कर ही,
अपना हाले-दिल सुनाती हैं.
मैं तो चिल्लाते रहता हूँ,
हर घडी, उनका नाम,
एक पल जो ना सुनाई दूँ उनको,
तो दौड़ी-दौड़ी चली आती हैं.
वो रातो का श्रृंगार,
मेरी आँखों से करती हैं.
परमीत सिंह धुरंधर