बिंदिया


उसका नाम था बिंदिया,
सावलें बदन पे,
रखती थी जो दो चंचल अँखियाँ।
कैसे ना डूबता,
उसके प्यार के सागर में,
एक ही मुस्कान से उदा देती थी,
जो रातों की निंदिया।
अच्छे पल थे,
सुनहरे कल के सपनों में।
मुझे क्या पता था की,
मेरी जल जायेगी दुनिया।
इल्जाम मुझपे ही आये सारे,
कुछ पल मैं भी,
गम और शिकायत में जिया।
मगर, यहाँ से अब न शिकायत है,
न कोई कोसिस।
बस याद आती है,
उनकी वो बेवफाई,
और उनकी मीठी बतिया।

परमीत सिंह धुरंधर

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