हुजूर


मुझसे मत पूछो इन आँखों का कुसूर,
शहंशाह तो मैं ही आज भी, पर वे हैं मेरे हुजूर।
जुल्म भी उनकी और हम उफ़ तक न करे,
खिदमत भी उनकी और वो खुश न रहें,
की मोहब्बत का बस एहि है दस्तूर।

परमीत सिंह धुरंधर

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