धीरे-धीरे विचलित हो रहा है मन, रूप तेरा देख के,
संयम कैसे रखूं, बता जरा अपने नयनन से.
कोई सजा, मौत की भी परवाह नहीं,
एक बार मिल जाए अधर मेरे तेरे अधरों से.
परमीत सिंह धुरंधर
धीरे-धीरे विचलित हो रहा है मन, रूप तेरा देख के,
संयम कैसे रखूं, बता जरा अपने नयनन से.
कोई सजा, मौत की भी परवाह नहीं,
एक बार मिल जाए अधर मेरे तेरे अधरों से.
परमीत सिंह धुरंधर