नदिया बोली सागर से,
इश्क़ तेरा झूठा है.
मैं आई इतनी दूर से,
प्यार में तेरे भागी -भागी।
तू एक कदम भी ना आगे बढ़ा,
प्यार तेरा छोटा है.
सागर बोला सुन प्रिये,
प्यार मेरा ही सच्चा है.
तू बहती है तोड़ के,
हर रिश्ते, मर्यादा को,
मैंने संभाला के रखा है,
अपने किनारों को.
तू राह बदल दे जब भी चाहे,
मैंने बाँध रखा है,
अपनी धाराओं को.
ऐसा नहीं की मुझे तेरी चाह नहीं,
पर डरता हूँ तेरी चंचलता से.
वरना आज भी,
मेरे इन अधरों पे,
तेरा चुम्बन वो ताजा है.
और मेरी बाहें तेरे जिस्म से,
आज भी महका-महका है.
परमीत सिंह धुरंधर