अब भूख लगी है,
प्यास मिटने के बाद,
की रात का इंतज़ार नहीं होता,
मंडप में तुम्हे देखने के बाद.
छोड़ो, ये सात-फेरों की रस्में,
मेरी किस्मत पे एतबार नहीं,
ए मालिक,
तुझे देखने के बाद.
बहुत दूर से आया हूँ,
तुम्हे अपना बनाने को.
अब पर्दा बर्दास्त नहीं होता,
यूँ नजरे मिलाने के बाद.
परमीत सिंह धुरंधर