जब से जवान भइल बारुं,
दुल्हन धमाल भइल बारु।
झूललतारु, खेललतारु,
ससुरा में झुलुआ डाल के.
ललुआ भइल, भलुआ भइल,
पर बारु अभिवो कमाल के.
निकललतारु, चललतारु,
घुंघटा तू डाल के.
दामाद उतरल, बहू उतरल,
पर बारु अभी वो सोलह-साल के.
परमीत सिंह धुरंधर
जब से जवान भइल बारुं,
दुल्हन धमाल भइल बारु।
झूललतारु, खेललतारु,
ससुरा में झुलुआ डाल के.
ललुआ भइल, भलुआ भइल,
पर बारु अभिवो कमाल के.
निकललतारु, चललतारु,
घुंघटा तू डाल के.
दामाद उतरल, बहू उतरल,
पर बारु अभी वो सोलह-साल के.
परमीत सिंह धुरंधर
मशहूर था जब मैं तब वो,
एक तितली बन कर आयीं।
मेरे उपवन के पुष्पों पे,
पंखों को फैला के मण्डराई।
जब युद्ध छिड़ा मेरा सावन से,
सूरज ने जोर लगाई।
जब सूखने लगे फूल मेरे,
बादलों ने ना अपनी बूंदें बरसाई।
तब वो तितली ने कही और जाकर,
दूसरे उपवन में घर बसाई।
परमीत सिंह धुरंधर
खूबसूरत वादियां बस खूबसूरत ही होती हैं,
वो भी बहुत ग़मगीन होती हैं,
रिश्तों की नजाकत को ऐसे समझा करो,
हर नजर अँधेरे में रोती है.
परमीत सिंह धुरंधर
उम्र भर की मुझे दुआ देने वालो,
अपनी दुआओं में उनका नाम रख दो.
मेरा हर दुकुं वो ही है वो ही,
मेरी इस जमीन पे वो एक माटी रख दो.
टूटने से पहले बिछुड़ना पड़ता हैं,
सबकी ख़ुशी में गम सहना पड़ता है.
उनकी नजर है इबादत मेरी,
मेरे जनाजे पे वो एक तस्वीर रख दो.
तरसता रहा हूँ साड़ी जिंदगी,
ये प्यास होंठो पर रख कर.
आँखे तो अब न देख पाएंगी उन्हें,
काम-से-काम, चेहरे पे वो आँचल रख दो.
उम्र भर की मुझे दुआ देने वालो,
अपनी दुआओं में उनका नाम रख दो.
परमीत सिंह धुरंधर
अब मुझसे मत पूछ मेरा शौक तू,
ये ही तो दुःख है की आज भी मेरा शौक तू.
कोई गिला नहीं तेरी इस माशूमियत से,
हर बार हाल दिल पूछ कर बन जाता है अनजान तू.
परमीत सिंह धुरंधर
अपनी किस्मत ही इस कदर थी रूठी,
सारी उम्र गुजर गई आँखों में बसकर।
जो जुदा हुए उनकी पलकों से,
उनकों देखा नाचते हुए उनकी वक्षों पे थिरक कर.
परमीत सिंह धुरंधर
नीचे गिरना किस्मत का ठगना नहीं है,
कभी कभी नीचे गिरने वालों को ही जन्नत मिलते हैं.
आँखों से दो आंसू ढलके, गालो पे सुलगते हैं,
जो विरले होते हैं, वो गिरकर होंठों को चूमते हैं,
जो होते हैं और भी किस्मत के धनी,
वो और नीचे गिरकर, वक्षों में बसते हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
उनकी दवा की दूकान है,
और वो दिल का इलाज करती हैं.
इसलिए मैं बीमार रहता हूँ, की
वो मेरे सीने पे स्टेथोस्कोप,
और नब्ज पे हाथ रखती हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
रोटी पकाना छोड़ दूँ,
चूल्हा जलाना छोड़ दूँ,
आँगन बहारना छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये.
सास की सुनना छोड़ दूँ,
देवर का मानना छोड़ दूँ,
ननद संग खेलना छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये.
गोबर निकालना छोड़ दूँ,
चिपरी पाथना छोड़ दूँ,
लेगी लगाना छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये.
सुबह में उठना छोड़ दूँ,
साज-सवारना छोड़ दूँ,
पास तेरे आना छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये.
पास-पड़ोस छोड़ दूँ,
चौकी-चूल्हा छोड़ दूँ,
घर-आँगन छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये.
दीप जलाना छोड़ दूँ,
पूजा-पाठ छोड़ दूँ,
सखी-सहेली छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये.
परमीत सिंह धुरंधर
सीवान जाना छोड़ दूँ,
छपरा में बैठना छोड़ दूँ,
मलमलिया, रुकना छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये।
खेत में सोना छोड़ दूँ,
भैंसों को चराना छोड़ दूँ,
पोखर में नहाना छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये।
बीज डालना छोड़ दूँ,
फसल पटाना छोड़ दूँ,
नहर बांधना छोड़ दूँ ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये।
खेत-खलिहान छोड़ दूँ,
दोस्त-ज्वार छोड़ दूँ,
साली -सरहज छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये।
ताश खेलना छोड़ दूँ,
बाजी लगाना छोड़ दूँ,
भौजी के घर जाना छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये।
होली की मस्ती छोड़ दूँ,
गावं की गोरी, छोड़ दूँ,
नयन-मटक्का छोड़ दूँ,
तू बोल सोनिये, तू बोल सोनिये।
परमीत सिंह धुरंधर