पश्चाताप


राजपूत हो के भी,
मैंने कौन सा युद्ध लड़ा?
इतिहास के पन्नो पे,
मैने क्या है लिखा?
एक महान पिता की,
संतान हो के भी,
मैं नारी के तन से,
खेलता रहा.
एक चक्रवर्ती का पौत्र,
हो कर भी,
मैं यूँ ही जुल्फों से,
बंधा रहा.
उनकी अधरों की लाली,
और देह का चुम्बन,
के पीछे मैं,
भागता रहा.
धिक्कार है मुझे,
मेरे जीवन पे.
मैं उनकी घुंघरुओं पे,
कीड़ों सा मचलता रहा.
अब सजे कुरुक्षेत्र,
मेरे ईश्वर.
रौंद दूंगा।
तीरों से वेंधा जाऊं,
या तलवार से कटा जाऊं,
लेकिन धरती से आकाश तक,
मैं भी भीषण प्रहार करूँगा.

परमीत सिंह धुरंधर

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