शैवाल का प्रेम


मेरा प्रेम,
एक पश्चाताप,
बन के रह गया.
सागर की लहरों पे,
एक शैवाल,
बन के रह गया.
क्या लिखूं?
उस प्याले के लिए.
जो मेरी अधरों से,
लग कर भी,
शहंशाह के महल,
की दीवारों पे सज गया.

परमीत सिंह धुरंधर

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