मोहब्बत


नदियां उछलती हैं तो किनारे डूब जाते हैं,
हुस्न सवरता हैं, तो दर्पण टूट जाते हैं.
मोहब्बत बाहों का बाहों से मिलान नहीं है यार,
ये तो वो रिश्ता हैं,
जहाँ बिना जाम के ही लैब भींग जाते हैं.
और हलक सूखे-सूखे, प्यासे रहते हैं,
हम जीते हैं उनके इंतज़ार में,
जो अपनी हर राह को जुदा किये बैठते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

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