अपने दर्द को समेटे, बैठा है समंदर,
आंसुओं को सैलाब बना के.
कोई क्या समझेगा जिंदगी,
जो जीता है गमो को बिना मुस्करा के.
परमीत सिंह धुरंधर
अपने दर्द को समेटे, बैठा है समंदर,
आंसुओं को सैलाब बना के.
कोई क्या समझेगा जिंदगी,
जो जीता है गमो को बिना मुस्करा के.
परमीत सिंह धुरंधर