कभी फिर


तुम ऐसे मिले मुझसे,
की नजरे हटी न कभी फिर.
तन्हा-तन्हा सा रहता हूँ,
नींदे आयीं न कभी फिर.
अच्छा है की हम्मे ये दूरी है,
मेरी भी मज़बूरी है.
तुम जो अपने पास होते,
हम सो न पाते कभी फिर.

परमीत सिंह धुरंधर

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