एक प्रयास हो


अधूरी तमन्नाएँ, शिकार करती हैं,
जिस्म पे नहीं, मन पे प्रहार करती हैं,
इनसे भी जो बच जाओ,
तो फिर, हताश करती हैं.
तो उठों, दोस्तों,
एक प्रयास हो.
ये मालुम है की हार निश्चित हैं मेरी,
मगर कहीं तो अपना विकास हो.
कब तक बहायेंगे ये आंसूं गरीब बनके,
अपनी ही बस्ती में अमीरों की जागीर बनके।
तो उठों, दोस्तों,
एक प्रयास हो.
अपने भी जीवन का,
कोई तो एक श्रृंगार हो,
ये मालुम है की हार निश्चित हैं मेरी,
मगर कहीं तो अपना विकास हो.

परमीत सिंह धुरंधर

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