बिषय ही ऐसा था,
विवाद हो गया,
सारे शहर में खुले – आम,
बवाल हो गया.
दुकानें हो गयी बंद,
और,
लोग घरों में छुप गए,
गली-गली में ऐसे,
कोहराम मच गया.
छा गए थे जो बादल,
बरसने को उमड़-उमड़ के,
वो भी छट गए,
और,
सूरज फिर से प्रखर हो गया.
देखो, कैसे अब,
आसमां का रंग बदल गया.
अमीर के घरों पे आ गए हैं तारे,
और गरीब,
जला-जला कर दिया,
हर रात गरीब हो रहा.
भूख से बिलखती एक भीड़ देखी,
जिसे, एक नेता,
आज अमीर बनने का सपना दे गया.
भैंसो पे बैठे, हँसते बच्चे,
आज उनको कोई हाथों में मोबाइल दे गया.
की शहर से फैला ये रोग,
आज गावँ-गावँ में आ गया.
परमीत सिंह धुरंधर