Men too


I always wanted to change the world
On my first day on the campus
I saw her giving a speech
How to change the world.

Rest of the life
She spent to change my life
And rest of the life
I spent to change myself
For her happiness.

Finally, we are divorced
Her last sentence was
“The world cannot change.”
“And men too.”

Rifle Singh Dhurandhar

आधुनिक भारत में सामाजिक न्याय


मैंने कहा, “मैं चोर नहीं हूँ.”
न्याय की कुर्सी से आवाज आई
तुम ही चोर हो.
उन कुर्सियों पे बैठी थी नारियाँ
न्याय की देवियाँ
और उनके पीछे खड़े थे, पुरुष।
……
और मैंने देखा
न्याय की देवियों की आँखे
देख रही थीं नफ़रत से
मेरे सर पे तितर-बितर बाल को
चिपटे – नाक को
मोटे-भद्दे, बाहर निकले मेरे होंठ को
और मेरे काले कुरूप काया को.
……
बेड़ियों में जकड़ा मैं
देख रहा था
ब्रिटिश-सम्राज्यवाद के न्याय को
जो अपने उत्कर्ष पे था.
……
अंत में कटघरे में लायी गयी
एक सुन्दर सी नारी
जिसका मुख
सूर्य की किरणों सा दिव्या था
और वक्ष
हिमालय सा उन्नत।
बिना उसके शब्दों को सुने
न्याय की देवियों ने
एक स्वर में कहा, “ये ही कुलटा है.”
इसने ही अपने अंगों की मादाकता
और अपने नयनों की चंचलता
अपने यौवन की मधुरता
से उस भीड़ को उकसाया था.
जैसे कोई किसान
स्वछंद चरते किसी पशु को
कोई बालक
शांत बैठे मधुमखियों को
उकसाता है.
अतः, इसका अपराध
शास्त्रों के अनुसार
निंदनीय नहीं, दण्डनीय है.
……
और मैं स्तब्ध
देख रहा था
वैशाली के गणराज्य को
गणतंत्र को
जो अपने उत्कर्ष पे था
……..

परमीत सिंह धुरंधर

घूँघट और चीरहरण


मेरा इश्क़, कोई हवस नहीं है
अतः यह किसी भीड़ की मोहताज नहीं है
हुस्न और मेरी राहें हैं अलग -अलग, पर
मेरा मकसद घूँघट उठाना है, कोई चीरहरण नहीं है.

परमीत सिंह धुरंधर

बरसे भी तो जलती ही आग है


कण – कण में व्याप्त है
फिर भी अपर्याप्त है
लालसा है मन की
या लिखित बेचैन ही भाग्य है.
अंत नहीं भूख का
जहाँ मौत भी एक प्यास है.
आँखों के काजल सा
बिजुरी में बादल सा
बरसे भी तो हाँ, जलती ही आग है.
दिखता नहीं
निकलता नहीं
छुपता नहीं, फिर भी
रौशनी के मध्य
एक अदृश्य – अन्धकार है.

नयनों के खेल सा सा
दिलों के मेल सा
जो तोड़े न मन को
जो जोड़े ना तन को
जिससे मिलन को
हर पल उठती हाँ टिस है
मधुर मिलन पे फिर
लगती भी ठेस है.
ऐसी है वासना
फिर भी है छोटी
आगे उसके
ऐसा अनंत तक उसका विस्तार है.

बांधों तो वो बांधता नहीं है
साधो तो वो सधता नहीं है
कालचक्र से भी परे है वो
काल से भी वो मिटता नहीं है.
सृष्टि उसके बिना अपंग – अपूर्ण है
और उसके संग सृष्टि, नग्न – न्यून है.
है मिश्री के मिठास सा
अंगों पे श्रृंगार सा
नारी जिसके बिना सुखी एक डाल है.
और यौवन जिसके बिना हाँ बस एक लास है.

परमीत सिंह धुरंधर

माहिर


निकला था राजकुमार सा
अब मुसाफिर हो गया हूँ.
ए जिंदगी देख तेरे इस खेल में
एक मासूम मैं, कितना शातिर हो गया हूँ?

देखता था हर एक चेहरे में माँ और बहन ही
पर इनकी नियत और असलियत देख कर
मैं भी अब माहिर हो गया हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

बादल बरसने से इंकार करने लगे हैं


बादल बरसने से इंकार कर रहे हैं
हवाओं का रुख भी बदलने लगा है
फूल, कलियाँ, भौरें, सब मुख मोड़ने लगे हैं.
ए दिल ये किस मोड़ पे आ गया हूँ ?
चाँद, तारे, सब राहें बदलने लगे हैं.
किस से कहें हाले-दिल अपना?
हर चेहरा मुझे देख के नकाब पहनने लगा है.
बादल बरसने से इंकार करने लगे हैं.

जो सत्ता में हैं, वो मेरे अब साथी नहीं
जो विपक्ष में हैं, वो अब साथ आते नहीं।
वो जो अब तक मेरी हर परेशानी में
मेरे पास बैठे थे.
वो जो अब तक अपनी हर परेशानी में
मुझे अपने पास बुलाते थे.
मुझसे सम्मिलित हर समीकरण
वो अब बदलने लगे हैं.
बादल बरसने से इंकार करने लगे हैं.

नजरों का बस एक फेर है जिंदगी
वो जो मेरे थे कल तक
अब मुझसे कतराने लगे हैं.
वो जो मुझसे पूछ कर सवरते थे
वो जो मेरे कहने पे रंग बदलते थे
इस कदर बदल गया है राहे -सफर उनका
की भीड़ को मेरे खिलाफ उकसाने लगे हैं.
बादल बरसने से इंकार करने लगे हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

किसके लिए?


अजीब दास्ताँ है ये, खुद हमारे लिए
ये शहर मेरा नहीं तो मुस्करायें किसके लिए?

दफ़न कर चूका हूँ जो ख्वाइशें कहीं
उन्हें सुलगाऊँ भी तो अब किसके लिए?

वो छोड़ गयीं मुझे एक ही रात के बाद
अब घर बसाऊं भी तो किसके लिए?

यादों का गठबंधन तोड़े कैसे पिता?
जब तुम ही नहीं तो जीयें किसके लिए?

खुदा भी जानता है की हम है अकेले
खुशियाँ बाटूँ भी तो किसके लिए?

जमाने से दुश्मनी है मेरी सदियों से
जमाने से बना के रखूं भी तो किसके लिए?

मुबारक हो हिन्द, जिन्हे मंदिर – मस्जिद चाहिए
मैं सजदा करूँ भी तो अब किसके लिए?

परमीत सिंह धुरंधर

पीछे – पीछे पथ गमन करने लगा


वो दुल्हन सी लगी
जो दौलत से सजी.
उसके पाप, पुण्य से लगे
उसकी वासना
नारी – अधिकार लगी.
उसका कहा हर एक शब्द
वेद के शब्द लगे.
और मैं नारी का सम्म्मान करने लगा
उसके आगे नतमस्तक हो
उसके पीछे – पीछे
पथ गमन करने लगा.

वो चरित्रहीन, कुलटा सी लगी
जब उसकी गरीबी में
फटी साड़ी में
उसकी जवानी चढ़ने लगी.
उसका आँखों में काजल लगाना
दुप्पटा संभालना
बच्चो को चूमना
सब हम पुरुषों को आकर्षित करने की
लालसा सी लगी.
और मैं पुरुष के दम्भ में
जबरदस्ती उसे पाने और उसकी लालसा मिटाने को
उसके पीछे – पीछे
पथ गमन करने लगा.

मेरा परुषार्थ असमर्थ है


देह की कामना,
देह को नहीं, मन को है.
देह की कामना,
देह से नहीं,
उसकी नग्नता, अर्ध-नग्नता से नहीं,
बल्कि उसपे चढ़े बस्त्रों से हैं.

देह की कामना,
सिर्फ शरीर, मांस, की नहीं,
उसकी अंगराई, हया, शर्म,
और उसकी साँसों के स्पंदन से है.
देह की कामना,
सिर्फ मुझपे जवानी आने,
और मेरी मर्दानगी के आभास से नहीं,
उसके नयनों की चंचलता,
अधरों की कपकपाहट,
कमर की लचक से है.

देह की कामना,
सिर्फ दृष्टि से परिभाषित नहीं,
देह की कामना,
स्वयं नारी के वक्षों, नितम्बों,
और उसके मादक लावायण्य,
विशाल, विकसित यौवन से,
संचालित है.

अतः मैं मिलना चाहता हूँ,
जानना चाहता हूँ, उन लोगो से,
जो ऐसे कामना को,
निरीह बच्चियों,
अर्ध-नग्न, नग्न स्त्रियों में देख लेते हैं.
वो उनकी सुंदरता,
उनके श्रृंगार की तुलना,
कैसे और किससे करते है?

मैं देखना चाहता हूँ,
समझना चाहता हूँ,
उनके ख़्वाबों, मेरे खवाबों की नारी के अंतर को,
उसके अंगों, वक्षों, हया और लावण्या के अंतर को.

शायद, अब देह की कामना,
नारी की लालसा,
सौंदर्य, रूप, अंग, मादकता से नहीं,
बस इससे है की,
वो सिर्फ एक नारी, मादा या लड़की है.

शायद, अब देह की कामना,
उसके अधरों, उसके नयनों, उसके जुल्फों से नहीं,
बस इससे है की,
वो यौन क्रिया को पूर्ण कर सकती है.

मेरी कलम अब भी,
असमर्थ है उस नारी जिस्म की कल्पना में,
जो वक्ष-विहीन, लावण्या – हीन,
अर्ध-नग्न या नग्न बस एक जिस्म हो.
और मेरा परुषार्थ भी असमर्थ है,
इस लालसा, देह की कामना,
को मुझमे जागृत करने,
और मुझे वासना से बसीभूत करने को.

 

परमीत सिंह धुरंधर

आज अकेली पड़ गयी है, कंगना


भारत वर्ष जिसके आँगन में,
रविश कुमार, विनोद दुआ,
और लाखों नारी के अधिकार के लिए,
लड़ने वाले, वामपंथी, सेक्युलर हैं,
वहाँ, आज अकेली पड़ गयी है, कंगना।

भारत वर्ष, जहाँ हिन्दू धर्म, सवर्णों में,
हर पल नारी विरोधी कर्म, मर्म,
ढूंढने वाले,
सिंदूर, करवा चौथ को नारी के पावों की बेड़िया बताने वाले,
लाखों वामपंथी, सेक्युलर हैं,
वहाँ, आज अकेली पड़ गयी है, कंगना।

भारत बर्ष, जहाँ नारी से कैसे बाते करते है?
कैसे नारी का सम्मान करते है?
क्यों राम गलत थे जो सीता का त्याग किया?
जहाँ लाखों नारे लगाते हैं नारी की मुक्ति को,
जहाँ सलमान खान, शाहरुख खान और अक्षय कुमार,
रोज कहते हैं बात नारी सुरक्षा का,
जहाँ लाखों वामपंथी, सेक्युलर हैं,
वहाँ, आज अकेली पड़ गयी है, कंगना।

 

परमीत सिंह धुरंधर