वफ़ा


उनकी आँखों से नशा लेकर,
रातो को वफ़ा देता हूँ.
मोहब्बत ही कुछ ऐसी है,
की साँसों -साँसों में जीता हूँ.
बखान नहीं हो सकता शब्दों में,
रिस्ता उनसे, ये मेरा।
हर पल में उनसे मैं,
अंजाना सा मिलता हूँ.
अब कल ही की तो बात है,
जब वो पास आयीं थी.
बाहर बरस रहे थे बादल,
अंदर एक दम, नयी उनकी अंगराई थी.
उनके जुल्फों के बोझ से दबा मैं,
और मेरे घुटते साँसों पे वो मुस्कराई थीं.

परमीत सिंह धुरंधर

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