खूबसूरत जिस्म पे,
अब भी है,
रातों का दाग.
खिड़कियाँ,
बंद ही रहने दो.
मुझे उजालों की नहीं,
अब भी,
इन ओठों की हैं प्यास।
ऐसा क्या है,
इन दिन- दोपहर में,
जो तुम मुझसे दूर भागती हो.
मत डालो,
ये उतारी हुई चुनर,
मुझे अब भी हैं,
इन अंगों की तलाश।
परमीत सिंह धुरंधर