ओ प्रियतमा


ओ प्रियतमा,
ओ प्रियतमा,
जब भोर हुई, तुम प्यारी लगी,
सूरज की प्रखरता सी.
जब रात हुई, तुम मधुर लगी,
चाँद की शीतलता सी.
इस नीरस जीवन में, तुम पुष्प सी,
सुगन्धित हो.
हर दोपहर की धुप में, हवा के,
थपेड़ो सी संग हो.
ओ प्रियतमा,
ओ प्रियतमा,
मेरे ह्रदय के हर दुःख में,
मेरे कापंते अधरों की तमन्ना हो.
मेरे हर सुख में, तुम मेरे,
बाहों का मंथन हो.
ओ प्रियतमा,
ओ प्रियतमा।

परमीत सिंह धुरंधर

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