हौसलें टूटते रहें,
पर लड़ाइयां लड़ी जाएंगी।
दुःख ही मिलेगा मगर,
चढ़ाइयां तो की जायेंगीं।
कोई साथ आता हैं तो आये,
या फिर साथ ना आये.
अपने साँसों के बल पे ही,
उचाईंयां नापी जाएंगी।
एक दीप तो जले कहीं,
फिर दीपमाला बनाऊंगा मैं।
रणभूमि तो सजें कहीं,
फिर रौंद के जाऊँगा मैं।
स्वतः के बलिदान से ही सही,
मगर ये बेड़ियां तोड़ी जाएंगी।
हौसलें टूटते रहें,
पर लड़ाइयां लड़ी जाएंगी।
परमीत सिंह धुरंधर