जिंदगी की मस्ती में मैं बहता चला,
मुझे कोई क्या रोक सकेगा भला.
मैं गिरता रहा, गिर कर उठता रहा.
मुझे कोई क्या रोक सकेगा भला.
लाखों राहें हैं मेरे लिए यहाँ बनीं,
पर मैं इन राहों का मुसाफिर नहीं.
उठ जातें हैं मेरे कदम खुद-ब-खुद उस तरफ,
जिस तरफ अंधेरों ने रखी है अपनी पालकी.
फूल कोई मेरी किस्मत में नहीं, ये जानता हूँ,
इसलिए बहारों से कोई रिश्ता, मैं रखता नहीं.
काँटों से उलझता हूँ मैं मुस्करा-मुस्करा कर,
की नशों में मेरे लहूँ की कमी नहीं.
ज़माने को ये नहीं हैं अंदाजा,
की ठोकरों में उसके हर हस्ती को, मैं तौलता चला.
जिंदगी की मस्ती में मैं बहता चला,
मुझे कोई क्या रोक सकेगा भला.
मैं गिरता रहा, गिर कर उठता रहा.
मुझे कोई क्या रोक सकेगा भला.
परमीत सिंह धुरंधर