मैं बहारों सी आई हूँ,
तू इश्क़ बनके छा जा.
मैं रेशम की धागा सी,
तू उसमे गाँठ बनके पड़ जा.
मैं बलखाऊं, लहराऊं, हवाओं सी,
तू मेरी राहों में पर्वत बनके आजा.
जब शाम ढले, तू ताड़ छेड़े,
मेरी रातों को बादल बनके भिंगो जा.
परमीत सिंह धुरंधर
मैं बहारों सी आई हूँ,
तू इश्क़ बनके छा जा.
मैं रेशम की धागा सी,
तू उसमे गाँठ बनके पड़ जा.
मैं बलखाऊं, लहराऊं, हवाओं सी,
तू मेरी राहों में पर्वत बनके आजा.
जब शाम ढले, तू ताड़ छेड़े,
मेरी रातों को बादल बनके भिंगो जा.
परमीत सिंह धुरंधर