जीवन प्यासा,
राते प्यासी,
प्यास बसी है,
इन अधरों पे.
ओठों के एक चुम्बन ने,
घाव किया दिल पे गहरी रे.
रात गयी,
वो भूल गयी.
मैं बैठा रहा,
बांधे वही गठरी रे.
नैनों का नैनों से,
फिर न मिलन ये होना था.
एक ही रात में सब ले गयीं,
ऐसी थी वो सुंदरी रे.
परमीत सिंह धुरंधर