गोरी जब से जवानी आई है,
हर तरफ से एक कहानी आई है.
कोई रखता है आज भी चोली तुम्हारी,
जिसकी सियान अब पुरानी हुई है.
हर गली, हर चौरस्ते पे,
सुबहा से होता है इंतज़ार तेरा।
जाने किस गली से तू निकलेगी,
और किन अंगों पे तेरे निशानी बनी हैं.
मत पूछ कैसे जीते हैं,
हम बेघर वाले।
हम पे तेरे आगोस की,
रूमानी अब तक छाई है.
थक के जो छूट गए,
तेरे आगोस से दूर.
उनके चेहरे पे, अब तक
वो जंगे-बईमानी खिली हुई है.
परमीत सिंह धुरंधर