मेरे प्यासे मन को,
तू अपने अंग लगा ले.
कुछ नहीं तो एक रात,
एक दीप ही संग जला ले.
मैं बैठा रहूँ,
उलझ के तेरी आँखों से.
तू मेरे सीने पे,
अपनी ये जुल्फ बिखरा ले.
तू खनका ये कंगन,
तू छनका ये पायल।
सारी रात, सारे जीवन,
बस मेरी धड़कन से तू ताल मिला के.
मुझे रख तू भूखा, प्यासा,
मेरे तन को भी बाँध के.
मगर अपने अधरों से प्रिये,
दो-दो बून्द चटा के.
परमीत सिंह धुरंधर