उन्नत वक्ष


तुम्हारे उन्नत-उन्नत वक्षों पे,
फीका है चाँद अम्बर का.
तुम्हे मय की क्या जरुरत,
नशा है तुमसे मयखाने का.
तुम चलो तो दरिया सुख जाए,
प्यास बढ़ जाए सागर का.
तुम्हारे गहरे-गहरे नैनों पे,
दम्भ है झूठा सागर का.
तुम्हे मय की क्या जरुरत,
नशा है तुमसे मयखाने का.
तुम्हारे नितम्बों पे झूलती ये चोटी,
जैसे चन्दन बन का मतवाला भुजंग।
तुम्हारे मधुर – मधुर इन अधरों के आगे,
देवों का अमृत विषैला है.
तुम्हे मय की क्या जरुरत,
नशा है तुमसे मयखाने का.

परमीत सिंह धुरंधर

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