मोहब्बत में पगला के हम भी,
बुरका पहनने लगे हैं.
वो तो दिखती नहीं हैं,
और हम भी खुद ही सवारने लगे हैं.
शर्मो-हया की अपनी दे के दुहाई,
वो बैठी है घर की दीवारों में,
और हम भी उनके छत पे,
अपनी पतंगें भिड़ाने लगे हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
मोहब्बत में पगला के हम भी,
बुरका पहनने लगे हैं.
वो तो दिखती नहीं हैं,
और हम भी खुद ही सवारने लगे हैं.
शर्मो-हया की अपनी दे के दुहाई,
वो बैठी है घर की दीवारों में,
और हम भी उनके छत पे,
अपनी पतंगें भिड़ाने लगे हैं.
परमीत सिंह धुरंधर