बिहार इतना विकसित हो,
दूर-दूर तक यूँ ही पुष्प पुलकित हों.
यूँ ही भ्रमरों का गुंजन हो,
यूँ ही फूलों से रसपान हो.
यूँ ही माँ के आँचल में,
लालों का चतुर्मुखी समृद्धि हो.
उंच-नीच भुला के,
इस वृक्ष की हर शाखा का,
हर दिशा में वृद्धि हो.
परमीत सिंह धुरंधर