रस


मैं रौंदत्ता हूँ और मैं रौंदूँगा,
मुझे जीत – हार का भय नहीं।
युद्ध किया है और करता रहूँगा,
मुझे विध्वंश का डर नहीं।
मैं नदिया नहीं जो राहे मोड़ लूँ,
न सागर हूँ, जो किनारों से बांध जाऊं।
रस पीया है, रस पियूँगा,
मैं भौरां हूँ,
मुझे कैद से भय नहीं।
बादलो का काम हैं सींचना,
काटें खिलें या फूल,
उससे उनको प्रेम नहीं।

परमीत सिंह धुरंधर

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