रसों का शौकीन मैं भी,
रसों का शौकीन तू भी.
बरसो हुए वो माटी छूटा,
बरसो हुए वो पानी मिला,
तो बता ये बंधू,
कैसे लाऊँ रस वही.
चौसा – लंगड़ा पे,
चटकारती मेरी जीभ,
अब तक प्यासी है,
फिर उसी स्वाद को.
तो बता ये बंधू,
कैसे लाऊँ रस वही.
परमीत सिंह धुरंधर