जिंदगी – मौत


तेरे दो नैनों के समंदर में,
कितनों के नाव डूबें हैं.
बस ओठों तक आने दे मुझे,
फिर जिंदगी – मौत, सब झूठे हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

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