इसी धरा पे हम भी जिए हैं,
इश्क़ का मजा लिए.
हर मोड़ पे वो खड़ी थी,
और हम थे गुलाब लिए.
उनके अब्बूज़ान की,
निगाहें बड़ी सख्त थी.
और मेरी निगाहों से,
हो जाती वो मस्त थीं.
आज तक याद है,
किनते पाँव चलती थीं,
वो घर से इबादतगाह तक.
और कितने पाँव,
स्कूल से घर तक.
परमीत सिंह धुरंधर