ख़्वाब


इसी धरती पे हमने देखा अंग्रेजों को जाते,
इसी धरती पे हमने देखा सिकंदर को हारते।
इसी धरती पे हमने देखा ख़्वाबों को टूटते,
इसी धरती पे देख रहे हैं हम ख़्वाबों को लूटते।
हर दाल पे बैठा है एक मदारी,
दिखता है ख़्वाब जो रंगीन जीवन के.
मगर कोई कह दे कैसे हम डालें,
रंग उनमे हकीकत के.
हर मंदिर में जाके हमने माथा अपना टेका,
हर मस्जिद में जाके दुआ की अपने रब से,
फिर भी हार जाते हैं, हम मंजिल पे आके.

परमीत सिंह धुरंधर

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