नशा जीत में नहीं,
जंग में है.
सागर की लहरो में नहीं,
मजधार में है.
लड़ना है जिंदगी में,
चारो तरफ से फंस के.
तैरना है सागर को,
मजधार में डूब के.
जोश सागर के पार जाने या,
पहाड़ की छोटी पे चढ़ने में नहीं,
मौत तक प्रयास में है.
मजा लहूँ के बहने में नहीं,
उसके रिसने में है.
नशा तलवार की धार में नहीं,
उसके टकराव में है,
उसकी आवाज में है.
परमीत सिंह धुरंधर