जब से सीना तुम्हारा उभरने लगा है,
गावं से शहर तक मौसम बदलने लगा है.
दुप्पटे के रंग से ही घायल हो रहे है यहाँ कितने,
और कितने,
बाँहों में भींचने का ख़्वाब सजोने लगे हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
जब से सीना तुम्हारा उभरने लगा है,
गावं से शहर तक मौसम बदलने लगा है.
दुप्पटे के रंग से ही घायल हो रहे है यहाँ कितने,
और कितने,
बाँहों में भींचने का ख़्वाब सजोने लगे हैं.
परमीत सिंह धुरंधर