लहूँ में छलक आते हो


दिलों के फासले, दूरियों से नहीं होते।
मेरी हर सांस में,
हर चाह में तुम छलक आते हो.
हमारा रिश्ता,
शब्दों में नहीं बखान हो सकता,
तुम तो अब मेरी लहूँ में छलक आते हो.
जमाने को क्या बताऊँ ?
की तुम कितने पसंद हो,
अब तो गैरों की बस्ती में भी,
तुम ही नजर आते हो.

परमीत सिंह धुरंधर

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