दर्पणों में चेहरे नहीं गुनाह दीखते हैं,
इसलिए तो हुस्न वाले इनसे सवरतें हैं.
करीब आने पे बोझ बढ़ जाता है,
इसलिए हर रात के बाद वो शहर बदल लेते हैं.
जाने आँचल है या बवंडर -तूफ़ान मरुत्स्थल का,
सैकड़ों को सुला कर बाहों में,
वो अब भी मासूम बन लेते हैं.
इश्क़ के नसीब में उजड़ना ही लिखा है,
ये तो हुस्न वाले हैं जो हवाओं के संग मुख मोड़ लेते हैं.
परमीत सिंह धुरंधर