बेबसी का दंश


दिल के हाथों मजबूर,
अंदाजे – हुस्न पे, कितने लिख गए.
बेबसी का दंश देखिये,
जाते – जाते भी जमाने से,
इश्क़ को बेवफा और हुस्न को,
मासूम लिख गए.
कौन तनहा रहना चाहता है,
इन दीवारों में.
हम उनकी ख़ुशी के लिए,
खुद पे ये जुल्म ढा गए।

 

परमीत सिंह धुरंधर

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