दास्ताने-मोहब्बत क्या कहें,
वो सूरते-बाज़ार में बिक गईं.
कुछ ऐसे जिस्म की चाहत थी,
की वो सैकड़ों की बाहों में झूल गईं.
हुस्न के इसी रंग पे,
ख्वाब बिकते हैं.
उनकी साड़ी, काजल पे हमने लुटाएं पैसे,
और वो किसी के पैसों पे,
साड़ी, काजल, अपना सब उतार गईं.
परमीत सिंह धुरंधर