कब तक दूसरों के चिराग से काम चलाऊ,
सोचता हूँ अब अपना दिया जला ही लूँ.
गम नहीं है जिंदगी यूँ ही अकेले अंधेरों में,
सोचता हूँ इन दीवारों को भी थोड़ी रौशनी दिखा हीं दूँ.
परमीत सिंह धुरंधर
कब तक दूसरों के चिराग से काम चलाऊ,
सोचता हूँ अब अपना दिया जला ही लूँ.
गम नहीं है जिंदगी यूँ ही अकेले अंधेरों में,
सोचता हूँ इन दीवारों को भी थोड़ी रौशनी दिखा हीं दूँ.
परमीत सिंह धुरंधर