तेरी आँखे ही काली नहीं, ए दिलरुबा,
रिश्ते भी इन आँखों के काले हैं.
जो भी डूबा हैं इन आँखों की मस्तियों में,
आज तक रो रहे उसके घरवाले हैं.
तेरी राते भीं जगमग करती हैं,
और उनके दिन भी जैसे गहरे अंधियारे हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
तेरी आँखे ही काली नहीं, ए दिलरुबा,
रिश्ते भी इन आँखों के काले हैं.
जो भी डूबा हैं इन आँखों की मस्तियों में,
आज तक रो रहे उसके घरवाले हैं.
तेरी राते भीं जगमग करती हैं,
और उनके दिन भी जैसे गहरे अंधियारे हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
वो चम्पाकली, तेरी आँखों को अपना बना लेंगे,
बस शर्म का पर्दा गिरा दे तू, काजल लगा देंगे।
यूँ ही देखा कर दर्पण, तू सुबह-सुबह उठ के,
नस – नस में तेरे, रातों को अंगार जला देंगे।
परमीत सिंह धुरंधर
कैंसर, गावं के उस भौजी की तरह है जो सबको देख के मुस्काती है. साड़ी संभाल-संभाल के बात करती है.
और लोग समझते हैं की इस का चक्कर सबसे है और उनको ही ज्ञान है.
परमीत सिंह धुरंधर
माँ और माटी का महत्त्व अब जाके मैं समझ पाया। अब पता चला की क्यों महाराणा प्रताप लड़ गए माटी के लिए.
परमीत सिंह धुरंधर
कस के पकड़ लो तुम बालम जी,
मेरी बाहों को.
मेरा मन भटक रहा है,
देख नजारों को.
देखो जरा मेरी कमर को,
कहाँ – कहाँ है तिल?
कब तक रखोगे?
यूँ बस, ओठों पे ओठों को.
क्या – क्या अरमान,
लेके आईं मैं मायके से?
कब तक यूँ जलाओगे?
तुम काठ की हांडी को.
परमीत सिंह धुरंधर
कोई निगाहें रखता है,
कोई इसारे रखता है.
जवानी चढ़ती है सबकी,
मगर, कोई – कोई ही,
सूरत पे सीरत रखता है.
कोई पीले दुप्पटे में,
कोई नीले दुप्पटे में.
मिल जाती हैं कई,
रोज गली – मोहल्ले में.
कोई मुस्कान रखता है,
कोई जुबान रखता है.
मगर, कोई – कोई ही,
दुप्पटे में जज्बात रखता है.
कोई मेहँदी लगा के,
कोई हल्दी लगा के.
रोज चलते हैं सभी,
अपने तन को सजा के.
मगर, कोई – कोई ही,
इस सजे तन के अंदर,
मीठा मन रखता हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
मोहब्बत नागिनों का है आभूषण दोस्तों,
इन अधरों के पीछे छुपा है गरल दोस्तों।
त्वचा है, निसंदेह इनकी बहुत ही मुलायम,
पर अंदर का दिल, है कठोर दोस्तों।
कितने रोएं हैं काँधे पे सर रख के मेरे,
और कितनों ने मिटाया है अपना जीवन दोस्तों।
नागिन कल भी डसती थी, नागिन कल भी डसेगी,
चाहे जितना भी उनको पिला लो शहद दोस्तों।
परमीत सिंह धुरंधर