जो सिर्फ सूरत देख के मुस्करा दे,
वो माँ है.
जो जेब की भार देख के मुस्कराए,
वो औरत है.
जो कीचड़-मिटटी से सने देह को,
अपने सबसे सुन्दर साड़ी से पोंछे,
वो माँ है.
जो रात में बाहों में आके भी, बाजार की,
साड़ियों और गहनों की बात करे,
वो औरत है.
परमीत सिंह धुरंधर