घुलने को मदिरा बनके


बारिश की बूंदें भी तड़प उठती है तन पे गिर के
ना चमको मेघों में तुम बिजली से छुप के
उतर आवो बाहों में
नशों में घुलने को मदिरा बनके
कब तक चमकेगी मेघों के बीच यूँ बिजली बनके
उतर आवो बाहों में
नशों में घुलने को मदिरा बनके।

परमीत सिंह धुरंधर

तू भी है राणा का बंसज


तू भी है
राणा का बंसज
फेंक जहाँ तक
भाला जाए.
जीत – हार तो
श्रीकृष्ण के हाथ है
कब तक जीवन यूँ जीया जाए?

अश्वों को थाम के
उतर जा कुरुक्षेत्र में
कब तक भोग -विलास में
समय बिताया जाए?
माना की तेरे नसीब में
यौवन का सुख नहीं
तू ही बता फिर धरती पे
किसे महाराणा बुलाया जाए?

गर नहीं विश्वास
तुझे ही लहू का
तो फिर कितना तुम्हे?
इतिहास पढ़ाया जाए.
सब हैं अमृत के प्यासे
किसकी प्यास गरल से बुझाई जाए?

प्रचंड-प्रबल वेग से गंगा
आतुर है सृष्टि को मिटाने को
काल को जो बाँध ले
उस महाकाल को क्यों न पुकारा जाए?
जीवन उसी का सार्थक है जग में
युगो -युगो तक जिसका नाम गाया जाए.

परमीत सिंह धुरंधर

First two lines (तू भी है राणा का बंसज. फेंक जहाँ तक भाला जाए. ) were written by Dr. Kumar Vishwas.

कलमुही का ह्रदय तेरा बटुआ जानता है


चाँद मेरी आँखों का इशारा जानता है
क्या करता है Crassa ये जमाना जानता है?
अच्छा है की तू मेरी ना बनी, आज भी तेरे पीछे
दिल मेरा, दीवाना भागता है.

XXXXXXXXX part2 by wife XXXXXX

यूँ शहर का नशा ना किया कर Crassa
तेरे लिया दही का निकला है मक्खन ताजा।
यूँ सौतन के पास ना जाया कर राजा
सारी रात मुझको, मेरा जोबन तोड़ता है.
दर्द क्या है विरह का, ये मेरा ह्रदय जानता है?
कहाँ – कहाँ मुँह मारता है Crassa, ये जमाना जानता है?

यूँ जन्मों का बंधन ना तोड़ो तुम Crassa
तुम्हारे लिए उठाउंगी जीवन की हर पीड़ा।
यूँ सौतन के पास ना जाया कर राजा
सजी – सजाई सेज, अब गरल लगता है.
अच्छा है की मैं ही तेरी हाँ बनी
उस कलमुही का ह्रदय, बस तेरा बटुआ जानता है.

This poem is dedicated to Panjabi poet Shiv Kumar Batalvi.

परमीत सिंह धुरंधर

तेरा रंग है सच्चा मेरी लाडो


यूँ चहका ना कर लाडो
नजर में शिकारी के आ जायेगी।
अभी तो एक कच्ची कलि है तू
बिना खिले ही मुरझा जायेगी।

यूँ निकला ना कर बाहर लाडो
नजर में गिद्धों के आ जायेगी।
अभी तो मासूम है बड़ी तू
बिन उड़े ही पिंजरे में आ जायेगी।

तेरा रंग है सच्चा मेरी लाडो
पर अब ये बस्ती सच्चा नहीं।
यूँ किसी से ना मिला कर लाडो
नजर में बाजों के आ जायेगी।
अभी पंख तेरे कमजोर हैं
पंजे में दुश्मनों के आ जायेगी।

परमीत सिंह धुरंधर

कण – कण में व्याप्त है श्रीराम


कण – कण में व्याप्त है श्रीराम
चाहे अयोध्या हो या अंडमान।

मंदिर बने या ना बने
जयकारों में गूँजते रहेंगे श्रीराम।

भूमण्डल के हर कोने – कोने मे
जन – जन के ह्रदय में है श्रीराम।

परमीत सिंह धुरंधर