मैं हिमालय पे अटल तपस्या कर दूँ,
मैं सागर में बैठ के, साँसों को रोक लूँ.
मगर मैं फिर भी अधूरा हूँ,
कैसे इस अपने दिल को समझाऊं।
मैं बादलों से बिजली को अलग कर दूँ,
मैं भूमंडल से ही ब्रह्माण्ड को चालित कर दूँ.
पर सब ज्ञान मेरा बेकार है,
क्यों की मैं नहीं जानता ए देवी,
कैसे तुम्हारा दिल जीत लूँ?
परमीत सिंह धुरंधर