पापा – वो – पापा,
आप मेरा ख्वाब थे.
खुले बगीचे में,
बादल की बूंदों सी,
मिठास थे आप,
मेरी जिंदगी का.
हरी घास पे,
नन्ही बूंदों सी,
नयी सुबह थे आप,
मेरे हर सपने का.
पापा – वो – पापा,
आप मेरा ख्वाब थे.
आप गंगा थे मेरे,
मैं किनारों का पत्थर।
डूब कर आपकी धाराओं में,
चमक उठा जिसका कण – कण.
आप हिमालय थे मेरा,
जिसकी घाटी में,
पुलकित हुआ,
और प्राप्त किया,
दुश्मनों की आँखों में खलने वाला,
मैंने ये योवन।
पापा – वो – पापा,
आप मेरी बुलंदी थे.
पापा, आप मेरी वो मदिरा थे,
जिसका नशा,
आज तक उतरा नहीं।
जिसके आगे कोई और,
जाम नहीं।
जिसके स्वाद में,
आज तक साँसों की,
प्यास मिटती नहीं।
मैं अपना मोक्ष भी,
ठुकरा दूँ,
बैंकुठ भी ठुकरा दूँ,
बस आपकी गोद,
और दुलार की खातिर।
पापा – वो – पापा,
आप मेरी साहस थे,
मेरी दौलत थे.
परमीत सिंह धुरंधर