वो भगवा ही क्या जिसमे रंग न छपरा से हो,
वो मिट्टी ही क्या जिसपे कोई वीर न छपरा से हो.
वो हुस्न ही क्या जिसका कोई आशिक न छपरा से हो,
वो वीर ही क्या जिसने जीता दिल न छपरा से हो.
वो राजनीति ही क्या जिसकी धुरी न छपरा से हो,
वो सत्ता ही क्या जिसपे बैठा न कोई छपरा से हो.
परमीत सिंह धुरंधर