जिंदगी का मज़ा,
जड़ों से जुड़े रहने में हैं.
आसमा की ऊचाइयाँ,
तो फरेब है.
जहाँ सूनेपन के अलावा,
कुछ भी नहीं है.
इश्क़ का मजा,
दिया बुझा कर नहीं।
सरेआम, खेतो खलिहानों में,
आँखों को लड़ाने में है.
परमीत सिंह धुरंधर
जिंदगी का मज़ा,
जड़ों से जुड़े रहने में हैं.
आसमा की ऊचाइयाँ,
तो फरेब है.
जहाँ सूनेपन के अलावा,
कुछ भी नहीं है.
इश्क़ का मजा,
दिया बुझा कर नहीं।
सरेआम, खेतो खलिहानों में,
आँखों को लड़ाने में है.
परमीत सिंह धुरंधर